बस्ती में भ्रष्टाचार का नंगा नाच: डिप्टी सीएमओ और विभाग के खेल पर उठे सवाल
सबसे शर्मनाक बात यह है कि जब इन मामलों की जांच के लिए अपर जिला सहकारी अधिकारी को भेजा गया, तो उन्होंने भी कथित रूप से सचिव से हाथ मिला लिया और मामले को रफा-दफा कर दिया। सचिव का यह कहना कि "हमारे मौसा योगीजी के साथ रहते हैं, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता," प्रशासनिक संरक्षण की ओर इशारा करता है।
अजीत मिश्रा (खोजी)
विशेष रिपोर्ट: बस्ती में भ्रष्टाचार का ‘सुशासन’, जहाँ शिकायतों के बावजूद बेखौफ हैं ‘रिश्वतखोर’
बस्ती: जनपद के प्रशासनिक और स्वास्थ्य महकमे में इन दिनों भ्रष्टाचार का एक ऐसा वीभत्स चेहरा सामने आया है, जिसे देखकर आम आदमी का व्यवस्था से भरोसा उठना स्वाभाविक है। भारतीय किसान यूनियन (भदौरिया गुट) और स्थानीय पत्रकारों द्वारा लगाए गए गंभीर आरोप केवल कागजी शिकायतें नहीं, बल्कि उस सच्चाई का आईना हैं जो प्रशासनिक गलियारों में दफन करने की कोशिश की जा रही है।क्या जनपद के प्रशासनिक गलियारों में भ्रष्टाचार का दीमक इतना गहरा पैठ चुका है कि शिकायतों के अंबार के बाद भी कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति होती है? हालिया घटनाक्रम और भाकियू (भदौरिया गुट) द्वारा उठाई गई आवाज इस बात का सबूत है कि जिले में जिम्मेदार कुर्सियों पर बैठे लोग ‘सब ठीक है’ का भ्रम फैलाकर अपनी जेबें भरने में व्यस्त हैं।
दस्तावेजों के आधार पर इस मामले के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
- डिप्टी सीएमओ डॉ. एके चौधरी पर गंभीर आरोप: उन पर भ्रष्टाचार का संगठित तंत्र चलाने का आरोप है। आरोप है कि वे अपने आवास पर अवैध वसूली करवाते हैं और ‘फार्म-एफ’ के नाम पर पैसे ऐंठते हैं।
- अवैध संरक्षण और मिलीभगत: डॉ. एके चौधरी पर झोलाछाप डॉक्टरों को संरक्षण देने का आरोप है। साथ ही, सिटी अल्ट्रासाउंड और भारत अल्ट्रासाउंड जैसे मामलों में अनियमितताओं के बावजूद उन पर कार्रवाई नहीं की जा रही है।
- प्रशासनिक लीपापोती: पत्रकारों और किसान संगठनों का आरोप है कि डिप्टी सीएमओ के खिलाफ शिकायतों पर विभाग केवल लीपापोती करता है। डॉ. एके चौधरी के खिलाफ 12 बिंदुओं पर जांच की मांग की गई है।
- कृषि क्षेत्र में भ्रष्टाचार: कुदरहा पिपरपाती गायघाट समिति के सचिव राजकुमार पाल पर उर्वरकों (यूरिया और डीएपी) की ओवर-रेटिंग का आरोप है। वे किसानों से ऑनलाइन के बजाय नकद भुगतान की मांग करते हैं ताकि अवैध वसूली पकड़ी न जाए।
- जांच में धांधली: किसान नेता उमेश गोस्वामी ने शिकायत की है कि खाद-बीज की धांधली की जांच करने आए अपर जिला सहकारी अधिकारी, आरोपी सचिव से मिलकर मामले को रफा-दफा कर देते हैं।
- संगठनात्मक बदलाव: उमेश गोस्वामी को भाकियू (भदौरिया गुट) का मंडल अध्यक्ष बनाया गया है, जो अब जिले में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर होकर काम कर रहे हैं।
डिप्टी सीएमओ और ‘वसूली’ का खुला खेल
पत्रकार राहुल सिंह द्वारा उठाए गए गंभीर सवाल यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर डिप्टी सीएमओ डॉ. एके चौधरी के खिलाफ अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई? आरोप है कि इनके विभाग में भ्रष्टाचार का ऐसा खेल चल रहा है कि जो भी ‘सेट-अप’ का हिस्सा नहीं बनता, वह टिक नहीं पाता। गरima चौधरी के नाम से अवैध वसूली और ‘फार्म-एफ’ के नाम पर खुलेआम पैसे ऐंठने के आरोपों के बाद भी विभाग की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। स्वास्थ्य विभाग के डिप्टी सीएमओ डॉ. एके चौधरी इन दिनों सवालों के केंद्र में हैं। उन पर लगे आरोप बेहद गंभीर हैं:
- अवैध वसूली का नेटवर्क: आरोप है कि डिप्टी सीएमओ ने एक समानांतर वसूली तंत्र बना रखा है। गरima चौधरी नामक एक सहयोगी के माध्यम से ‘फार्म-एफ’ के नाम पर अवैध रूप से पैसे वसूले जाते हैं।
- दबाव की राजनीति: चर्चा है कि विभाग में भ्रष्टाचार का यह खेल इस कदर फैला है कि जो भी इसके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करता है, उसे दरकिनार कर दिया जाता है। यह भी कहा जा रहा है कि अगर इनके कॉल डिटेल्स रिकॉर्ड (CDR) की निष्पक्ष जांच हो, तो भ्रष्टाचार की कई परतें खुल सकती हैं।
- लीपापोती में पीएचडी: शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि डॉ. चौधरी को भ्रष्टाचार की शिकायतों पर लीपापोती करने में महारत हासिल है। उनके खिलाफ 12 बिंदुओं पर जांच की मांग की गई है, जो अभी भी प्रतीक्षित है।
स्वास्थ्य के नाम पर ‘झोलाछाप’ को संरक्षण
एक तरफ जिले के स्वास्थ्य विभाग के दावों की पोल खुल रही है, तो दूसरी तरफ उन ‘झोलाछाप’ डॉक्टरों को संरक्षण दिया जा रहा है जो मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। आरोप है कि डिप्टी सीएमओ खुद ऐसे लोगों को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप अल्ट्रासाउंड केंद्रों में गंभीर अनियमितताएं हो रही हैं, लेकिन शिकायत के बावजूद कार्रवाई के नाम पर लीपापोती की जा रही है। डॉ. चौधरी पर केवल वित्तीय अनियमितता के ही नहीं, बल्कि मरीजों की जान से खिलवाड़ करने के भी आरोप हैं:
- झोलाछाप डॉक्टरों के नोडल: स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार पद पर रहते हुए उन पर आरोप है कि वे पैसे लेकर झोलाछाप डॉक्टरों को खुला संरक्षण दे रहे हैं।
- जांच में हेरफेर: सिटी अल्ट्रासाउंड और भारत अल्ट्रासाउंड जैसे मामलों में गंभीर अनियमितताएं पाई गईं, जहाँ मृत बच्चों को भी नॉर्मल रिपोर्ट दे दी गई। शिकायत के बावजूद, संरक्षण के चलते ये केंद्र धड़ल्ले से चल रहे हैं।
- सवालों के घेरे में विभाग: जिले के लोग अब यह पूछने पर मजबूर हैं कि आखिर किसके इशारे पर डिप्टी सीएमओ के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है? क्या सीएमओ और मंत्रालय का इन्हें मौन समर्थन प्राप्त है?
खाद-बीज केंद्रों पर किसानों का शोषण
भ्रष्टाचार का यह नासूर केवल स्वास्थ्य विभाग तक सीमित नहीं है। भाकियू (भदौरिया गुट) के मंडल अध्यक्ष उमेश गोस्वामी द्वारा तहसील दिवस में दी गई शिकायत यह बताती है कि कैसे खाद और बीज केंद्रों पर किसानों से ओवर-रेटिंग की जा रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब इन मामलों की जांच के लिए अपर जिला सहकारी अधिकारी को भेजा जाता है, तो वे कथित तौर पर आरोपितों से मिलकर ‘मामला निस्तारित’ कर देते हैं। भ्रष्टाचार का यह जाल स्वास्थ्य विभाग से निकलकर कृषि विभाग तक पहुँच चुका है। भाकियू (भदौरिया गुट) के मंडल अध्यक्ष उमेश गोस्वामी ने सबूतों के साथ बताया है कि कैसे किसानों को लूटा जा रहा है:
- ओवर-रेटिंग का खेल: कुदरहा पिपरपाती गायघाट समिति के सचिव राजकुमार पाल पर आरोप है कि वे 266.50 रुपये की यूरिया के लिए 300 से 320 रुपये और 1350 रुपये की डीएपी के लिए 1400 रुपये वसूल रहे हैं।
- ऑनलाइन भुगतान से डर: सचिव खुलेआम कैश में पैसे मांगते हैं, क्योंकि ऑनलाइन भुगतान करने पर उनकी ओवर-रेटिंग पकड़ी जाएगी।
- प्रशासनिक मिलीभगत: सबसे शर्मनाक बात यह है कि जब इन मामलों की जांच के लिए अपर जिला सहकारी अधिकारी को भेजा गया, तो उन्होंने भी कथित रूप से सचिव से हाथ मिला लिया और मामले को रफा-दफा कर दिया। सचिव का यह कहना कि “हमारे मौसा योगीजी के साथ रहते हैं, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता,” प्रशासनिक संरक्षण की ओर इशारा करता है।
निष्कर्ष: कब जागेगा प्रशासन?
बस्ती में भ्रष्टाचार का यह तंत्र केवल चंद अधिकारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संगठित व्यवस्था बन चुका है। पत्रकार राहुल सिंह और किसान नेता उमेश गोस्वामी का सड़क पर उतरना यह दर्शाता है कि अब जनता के धैर्य का बांध टूट रहा है।
क्या शासन इन तमाम सबूतों के बाद भी आंखें मूंदे बैठा रहेगा? जनता अब आश्वासन नहीं, बल्कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई और जेल की सलाखें चाहती है। जांच यदि निष्पक्ष हुई, तो निश्चित रूप से कई रसूखदार चेहरे बेनकाब होंगे।















